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Class 12th Hindi Chapter-7 बादल राग ( सप्रसंग व्याख्या ) ( आरोह- Aroh ) Badal Rag - Easy Explained

Class 12th Hindi Chapter-7 बादल राग ( सप्रसंग व्याख्या ) ( आरोह- Aroh ) Badal Rag - Easy Explained 

Class 12th Hindi Chapter-7 बादल राग ( सप्रसंग व्याख्या ) ( आरोह- Aroh ) Badal Rag - Easy Explained

परिचय:-

बादल राग निराला जी की प्रसिद्ध कविता है |

इसमें बादल को क्रांति का प्रतीक बताया गया है |

अतः बादल राग का आशय है – क्रांति का संगीत  

सन्दर्भ :-

प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह-भाग -2’ में संकलित प्रसिद्ध छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की बहुचर्चित कविता ‘बादल राग’ से लिया गया है | यह कविता मूल रूप में निराला जी के काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित तथा प्रकाशित हुई थी | 

तिरती है समीर-सागर पर

अस्थिर सुख पर दुख की छाया-

जग के दग्ध हृदय पर

निर्दय विप्लव की प्लावित माया-

यह तेरी रण-तरी

भरी आकांक्षाओं से,

घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर

उर में पृथ्वी के, आशाओं से

नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,

ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !

प्रसंग:-

बादल छायावादी कवियों का पसंदीदा विषय रहा है | खुद निराला जी ने ही बादल पर बहुत सी कविताएँ लिखी हैं |

इस कविता का आरम्भ समीर-सागर पर तिरती हुई अस्थिर सुख तथा दुःख की छाया के संकेत से होता है | 


व्याख्या:-

कवि कहता है की बादल वायु रुपी सागर के ऊपर अस्थिर सुख पर दुःख की छाया की तरह लहराते हुए मंडरा रहे हैं |

कवि को ऐसा प्रतीत होता है की संसार का ह्रदय दुःख के कारण जला हुआ है |

कवि का आशय यह है की बादल दुःख और शोषण से ग्रस्त संसार के ऊपर जल बरसाकर शोषण के खिलाफ क्रांति का उद्घोष करने वाले क्रांतिदूत की भूमिका में हैं |

कवि बादल को वीर योद्धा की संज्ञा देते हुए कहता है – ओ विनाशकारी बादलों ! तुम्हारी रणनौका अर्थात गरज-तरज और प्रबल आकांशा |

तुम्हारी गर्जन के नगाड़े सुनकर धरती की कोख में छिपे अंकुर नया जीवन मिलने की आशा से , धरती से फूटने की उमंग से सिर ऊंचा करके तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं |

हे विनाश के बादल ! तुम्हारी क्रांतिकारी वर्षा से ही दबे हुए अंकुरों का उद्धार हो पाएगा |

बार-बार गर्जन

वर्षण है मूसलधार,

हृदय थाम लेता संसार,

सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।

अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,

क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,

गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर।

हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार-

शस्य अपार,

हिल-हिल

खिल-खिल,

हाथ हिलाते,

तुझे बुलाते,

विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।

प्रसंग:-

निराला जी इस काव्यांश में बादलों के बरसने से उत्पन्न वातावरण तथा उनके वर्षण के विभिन्न प्रभावों का प्राकृतिक तथा समाजिक संदर्भ में चित्रण करते हैं | 

व्याख्या:-

हे बादल ! तेरे बार बार गरजने तथा धारासार बरसने से सारा संसार डर के मारे अपना कलेजा थाम लेता है |

तेरी भीषण गर्जन और घनघोर ध्वनि से सब लोग आतंकित हो जाते हैं | सभी को तेरी विनाश शीलता में बह जाने का डर सताने लगता है | 

अर्थात क्रांति का स्वर सुनकर पूरे संसार के लोगों के हृदय काँप जाते हैं |

बादलों के भयंकर वज्रपात से उन्नति के शिखर पर पहुंचे हुए सैकड़ों सैकड़ों वीर परास्त होकर भूमि भूमिसात हो जाते हैं | 

बादलों के भीषण तड़ित पात से आसमान को छूने की स्पर्धा में लगे हुए ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के कठोर शरीर तक घायल होकर छलनी हो जाते हैं |

जो जितने ऊंचे होते हैं, वे उतने ही ज्यादा घायल होते हैं |

जबकि उसी बादल की विनाशशीलता में छोटे से अस्तित्व वाले लघु पौधे हँसते हैं | वे उस विनाश से जीवन प्राप्त करते हैं |

इसलिए हे बादल ! वे छोटे छोटे पौधे तो तुझे हिल-हिल कर खिल-खिल कर, हाथ हिलाते हुए अनेक संकेतों से बुलाते हैं, तुझे निमंत्रण देते हैं |

तुम्हारे आने से उन्हें नया जीवन मिलता है | 

विनाश के शोर से हमेशा लघुप्राण ही लाभ पाते हैं |

अर्थात् क्रांति से शोषक वर्ग ही नष्ट होता है |

अट्टालिका नहीं है

आतंक-भवन

सदा पंक पर ही होता

जल-विप्लव-प्लावन,

क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से

सदा छलकता नीर,

रोग-शोक में भी हँसता है

शैशव का सुकुमार शरीर।

रुद्ध कोष है,

क्षुब्ध तोष

अंगना-अंग से लिपटे भी

आतंक अंक पर काँप रहे हैं।

धनी, वज्र-गर्जन से बादल!

त्रस्त–नयन मुख ढाँप रहे हैं।

प्रसंग:-

इस पद्यांश में कवि ने खुलकर धनी वर्ग पर चोट की है और शोषित लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट की है |

व्याख्या:-

कवि कहता है ऊँचे ऊँचे भवन, ये तो भय और त्रास के निवास हैं | इनमे रहने वाले लोग हमेशा डरे रहते हैं | जल की विनाशशीलता तो हमेशा कीचड़ में ही होती है |

वहीं बाढ़ और विनाश का दृश्य उपस्थित होता है | आशय यह है की हमेशा निम्न वर्ग के लोग ही क्रांति करते हैं | समृद्ध लोग तो डरे ही रहते हैं | सुविधाभोगी वर्ग के तुच्छ लोग क्रांति से घबराकर आंसू बहाते हैं |

अर्थात् वे हमेशा बाढ़ से डरे रहते हैं | आशय यह है की समृद्धि में पले कोमल शिशु क्रांति की ज्वाला नहीं सह सकते |

जबकि निम्न वर्ग के कोमल शिशु ऐसे संघर्षशील होते हैं की रोग और शोक में भी हमेशा मुस्कराते रहते हैं |

पूंजीपति लोगों ने धन से परिपूर्ण अपने खजानों को अपने लिए सुरक्षित रखकर बंद किया हुआ है |

उन्होंने औरों को उस धन से वंचित कर दिया है | इतना धन होने पर भी उनके मन में संतोष नहीं हैं |

वे हमेशा डरे रहते हैं | मोटे मोटे पूंजीपति अपने अपने महलों में अपनी पत्नियों के अंगों से लिपटे हुए भी कांप रहे हैं | उन्हें क्रांति का भय है |


जीर्ण बाहु,

है शीर्ण शरीर,

तुझे बुलाता कृषक अधीर,

ऐ विप्लव के वीर!

चूस लिया है उसका सार,

हाड़-मात्र ही है आधार,

ऐ जीवन के पारावार !

प्रसंग:-

इन पंक्तियों में कवि समाज के शोषक वर्ग तथा शोषित वर्ग अर्थात धनी वर्ग तथा गरीब वर्ग का चित्रण करता है | 

व्याख्या:-

कवि बादलों को संबोधित करते हुए कहता है – हे विनाश रचाने वाले बादल ! देखों तुम्हे जर्जर भुजाओं वाला, दुर्बल – हीन शरीर वाला किसान व्याकुल होकर बुला रहा है |

उसने अपनी भुजाओं का सारा बल जिस समृद्धि को उत्पन्न करने में गंवा गँवा दिया, उस समृद्धि ने उसके शरीर का सारा रस ही मानो चूस लिया |

इस पूंजीपति वर्ग ने ही किसान का शोषण करके उसकी ऐसी बुरी दशा बनाई है |

अब तो उस किसान के शरीर में मात्र हड्डियों का पंजर ही शेष रह गया है | उसका रक्त-मांस शोषण व्यवस्था ने चूस लिया है | 

ऐसी अवस्था में हे जीवन दाता, जल के सागर, बादल ! तुम्ही बरसकर उस पर कृपा करो |

तुम्ही ऐसी क्रांति करो, जिससे वह शोषण मुक्त हो सके तथा उसकी सूखी हड्डियों में पुनः रक्त-मांस आ सके |

विशेष:-

भाषा संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक हिंदी है |

प्रतीक, बिम्ब तथा लाक्षणिकता का सुंदर प्रयोग मिलता है |

बादल को क्रांतिकारी योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया गया है |

लघु - लघु शब्दों के कारण कविता में अद्भुत प्रवाह का संचार हो रहा है |

बादलों का मानवीकरण किया गया है |

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